Monday, May 31, 2010

राहत इंदोरी - शायर ए ज़माना

उँगलियाँ यूँ न सब पर उठाया करो
खर्च करने से पहले कमाया करो

ज़िन्दगी क्या है खुद ही समझ जाओगे
बारिशों में पतंगें उड़ाया करो

दोस्तों से मुलाक़ात के नाम पर
नीम की पत्तियों को चबाया करो

शाम के बाद जब तुम सहर देख लो
कुछ फ़क़ीरों को खाना खिलाया करो

अपने सीने में दो गज़ ज़मीं बाँधकर
आसमानों का ज़र्फ़ आज़माया करो

चाँद सूरज कहाँ, अपनी मंज़िल कहाँ
ऐसे वैसों को मुँह मत लगाया करो

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6 comments:

  1. बहुत बढिया.... भाई राहत इंदौरी जी को पढवानें के लिए बहुत बहुत शुक्रिया....

    राहत इंदौरी साहब की हर रचना जोश से भरी हुई एक उर्ज़ा लिये हुए होती है, बहुत बेहतर पोस्ट.

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  2. @ DEV KUMAR JHA
    शुक्रिया

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  3. शुक्रिया राहत जी की रचना के लिए।

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  4. bhai jaan kambakht hum na kuch kar sake hum hi na kuch kah sake humi na kuch likh sake............like baris me na patang hi udayi, na dosti ke baad neem chabayi.......isiliye aisa hai......kuch line zahan me aayi pasand aaye to daad de digiyega
    gud(sakkar) gud na raha gajjak ho gaya,
    galib siwal sayro ki sayri ke boote paida talat ho gaya
    ke raat ke wazood se din aur din ke wazood se raat ho gayi..
    aur sayad garmi ke hone se hi barsaat ho gayi........
    to main kaun hoon.......to main kaun

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