Friday, July 9, 2010

शकील बदायूनी मशहूर ग़ज़ल

आज कुछ पुराने दीवान देख रहा था, उनमे मुझे मरहूम शकील बदायूनी की इक बहुत मशहूर ग़ज़ल मिली. लीजिए आपकी पेशे खिदमत है...

ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया
जाने क्यों आज तेरे नाम पे रोना आया

यूँ तो हर शाम उम्मीदों में गुज़र जाती थी
आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया

कभी तक़्दीर का मातम कभी दुनिया का गिला
मंज़िल-ए-इश्क़ में हर गाम पे रोना आया

जब हुआ ज़िक्र ज़माने में मोहब्बत का ‘शकील’
मुझ को अपने दिल-ए-नाकाम पे रोना आया

Wednesday, July 7, 2010

डा० वसीम बरेलवी मेरे पसंदीदा शायर

डा० वसीम बरेलवी मेरे पसंदीदा शायर हैं , उनकी इक और ग़ज़ल पेशे ख़िदमत है.

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसे
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक नज़र आयें कैसे

घर सजाने का तस्सवुर तो बहुत बाद का है
पहले ये तय हो कि इस घर को बचायें कैसे

क़हक़हा आँख का बरताव बदल देता है
हँसनेवाले तुझे आँसू नज़र आयें कैसे

कोई अपनी ही नज़र से तो हमें देखेगा
एक क़तरे को समुन्दर नज़र आयें कैसे

Monday, July 5, 2010

वसीम बरेलवी मेरे पसंदीदा शायर

वसीम बरेलवी

उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है
जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है

नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये
कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है

थके हारे परिन्दे जब बसेरे के लिये लौटे
सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है

बहुत बेबाक आँखों में त’अल्लुक़ टिक नहीं पाता
मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है

सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का
जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है

मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो
कि इस के बाद भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Friday, July 2, 2010

सतीश सक्सेना साहब की नज़र

आज मुनव्वर राना की ये ग़ज़ल में अपने शुभचिंतक जनाब सतीश सक्सेना साहब की नज़र करता हूँ.

जब कभी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है

मां दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है



रोज़ मैं अपने लहू से उसे ख़त लिखता हूं

रोज़ उंगली मेरी तेज़ाब में आ जाती है



दिल की गलियों से तिरी याद निकलती ही नहीं

सोहनी फिर इसी पंजाब में आ जाती है



रात भर जागते रहने का सिला है शायद

तेरी तस्वीर-सी महताब में आ जाती है



एक कमरे में बसर करता है सारा कुनबा

सारी दुनिया दिले- बेताब में आ जाती है



ज़िन्दगी तू भी भिखारिन की रिदा ओढ़े हुए

कूचा - ए - रेशमो - किमख़्वाब में आ जाती है



दुख किसी का हो छलक उठती हैं मेरी आँखें

सारी मिट्टी मेरे तालाब में आ जाती है




महताब=चांद; रिदा= चादर

Monday, June 28, 2010

शहरयार : इक अंदाज़

मशहूर शायर जनाब शहरयार साहब की ये ग़ज़ल मैं अपने दोस्त जनाब प्रदीप गुप्ता की नज़र करता हूँ. गुप्ता जी के बारे में इतना ही कहूँगा...
क़सम खुदा की मुहब्बत नही अक़ीदत है
दयारे दिल में बहुत एहतेराम है तेरा



अजीब सानेहा मुझ पर गुज़र गया यारो
मैं अपने साये से कल रात डर गया यारो

हर एक नक़्श तमन्ना का हो गया धुंधला
हर एक ज़ख़्म मेरे दिल का भर गया यारो

भटक रही थी जो कश्ती वो ग़र्क-ए-आब हुई
चढ़ा हुआ था जो दरिया उतर गया यारो

वो कौन था वो कहाँ का था क्या हुआ था उसे
सुना है आज कोई शख़्स मर गया यारो