मशहूर शायर जनाब शहरयार साहब की ये ग़ज़ल मैं अपने दोस्त जनाब प्रदीप गुप्ता की नज़र करता हूँ. गुप्ता जी के बारे में इतना ही कहूँगा...
क़सम खुदा की मुहब्बत नही अक़ीदत है
दयारे दिल में बहुत एहतेराम है तेरा
अजीब सानेहा मुझ पर गुज़र गया यारो
मैं अपने साये से कल रात डर गया यारो
हर एक नक़्श तमन्ना का हो गया धुंधला
हर एक ज़ख़्म मेरे दिल का भर गया यारो
भटक रही थी जो कश्ती वो ग़र्क-ए-आब हुई
चढ़ा हुआ था जो दरिया उतर गया यारो
वो कौन था वो कहाँ का था क्या हुआ था उसे
सुना है आज कोई शख़्स मर गया यारो